* कल्याणक तीर्थोद्धारक, शासन दिवाकर, पंजाब मार्तण्ड, गच्छाधिपति शांतिदूत जैनाचार्य श्री मद् विजय नित्यानंद सूरि जी म.सा, तप केसरी तपस्वी सम्राट आचार्य भगवन श्री मद् विजय वसंत सूरि जी म.सा आदि ठाणा 09 का 18 मार्च को जंडियाला गुरु में प्रवेश होगा। गोडवाड़ भूषण, ज्ञान प्रभाकर,स्वर्ण संत आचार्य श्रीमद् जयानन्द सूरी जी म.स. (भोले बाबा) जैतपुरा के पास हाथलाई में विराजमान है। दार्शनिक ज्योतिष सम्राट आचार्य श्री मद् विजय यशोभद्र सूरीश्वर जी म.सा आदि ठाणा श्री कावरा (छोटा उदयपुर) में विराजमान है।

Wednesday, 15 March 2017

जैन एकता का शंखनाद 

सिकंदराबाद में पंजाब केसरी गुरु वल्लभ समुदाय के गच्छनायक शांतिदूत जैनाचार्य श्रीमद् विजय नित्यानन्द सूरि जी महाराज की निश्रा में आयोजित ऐतिहासिक *संक्रांति समारोह में विभिन्न सम्प्रदायों और गच्छ - परंपरा के प्रभावक संतों द्वारा जैन एकता का शंखनाद*...

Tuesday, 14 March 2017

जिज्ञासा 3

"जैन पद्धति अनुसार सुबह कैसे उठना ?"


1. सर्वप्रथम अपने दोनों हाथों को मिलाकर उनके दर्शन करने चाहिए। चन्द्रमा रुपी सिद्धशिला के ऊपर विराजमान 24 तीर्थंकर की कल्पना कर उन्हें नमस्कार करना चाहिए।

2. परमात्मा की तरह हमारे भी सभी आठों कर्म क्षय ( ख़त्म ) हों, इस भावना से कम से कम 8 नवकार मन्त्र गिनने चाहिये।

3. नाक की जिस नली(Right or left) से श्वास अधिक आता हो, वह (right या left) पैर ज़मीन पर पहले रखना। यह स्वरोदय विज्ञान अनुसार है।

4. घर में इस प्रकार व्यवस्था करनी की सुबह उठते साथ कभी झाड़ू और जूते-चप्पल के दर्शन न हों । 

5. भगवान की प्रतिमा/फ़ोटो के आगे णमो जिणाणं कहकर गुरु की प्रतिमा / फ़ोटो के आगे विनयपूर्वक मत्थएण वंदामि कहना चाहिए

6. प्रातः काल वेला में यदि कोई शुभ स्वप्न देखा हो तो वह सीधे ही परमात्म प्रतिमा के समक्ष कह देना चाहिए। अशुभ स्वप्न देखे जाने पर मौनपूर्वक उसे भुला देना चाहिए।

7. अपने माता पिता के चरण स्पर्श करने चाहिए अथवा उनकी फ़ोटो के आगे शीश झुकाना चाहिए।

8. नवकारसी का पच्चक्खान अवश्य करना चाहिए। सूर्योदय से 48 मिनट तक कुछ न खाना पीना ही नवकारसी है जो बहुत ही आसानी से किया जा सकता है ।

9. सुबह उठने के साथ ही मोबाइल फ़ोन प्रयोग करना, टीवी देखना, समाचार पत्र पढ़ना आदि प्रवृत्तियों से परहेज़ रखना चाहिए। सुबह समय से उठ जाना चाहिए।

10. रोज़ सुबह यह विचार करना चाहिए की आज मुझे क्या क्या विशेष कार्य करना है। रात्रि में सोते समय विचार करना की आज मेरे द्वारा सोची गयी लिस्ट में से कितना काम ही मैं कर पाया। दिनभर में किये गए क्रोध एवं पापकार्य का विचार भी रात्रि विश्राम से पूर्व करना चाहिए।

( साध्वी प्रियधर्मा श्री जी म.सा. के प्रवचनों में से संग्रहित )
हैदराबाद में विभिन्न संघों में
 शांतिदूत गच्छनायक गुरुदेव का आगमन - मंगल प्रवेश तथा स्वागत

*पंजाब केसरी आचार्य विजय वल्लभ सूरि जी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति शांतिदूत जैनाचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरि जी म.सा* आदि ठाणा आज  सुबह एल बी नगर से विहार कर पहले चैतन्यपुरी पधारे वहां श्री वासुपूज्य स्वामी जिनमंदिर में दर्शन किये । वहां से 8 km विहार कर बेगम बाजार पधारे। वहां अत्यंत प्राचीन श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जिनमंदिर के दर्शन कर संघ को मंगलीक सुना कर वहां से  फीलखाना पधारे। वहां श्री महावीर स्वामी जिनमंदिर के दर्शन किये । वहां से गोशामहल जैन संघ में पधारे।

श्रीसंघ ने समैया किया गाजते बाजते मंगल प्रवेश के उपरांत गुरुदेव ने श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ जिनमन्दिर के दर्शन किये। तत्पश्चात् प्रवचन सभा का आयोजन हुआ। प्रवचन में गुरुदेव ने फ़रमाया कि आज चौमासी चौदस का महान पर्व दिन है । पर्व प्रेरणा के प्रतीक तथा सम्यग आराधना - उपासना - साधना  के विशेष अवसर होते हैं । इन प्रसंगों पर हमें सांसारिक कार्यों को गौण कर तप जप आराधना करनी चाहिए।

संघ के सदस्यों ने यहां बनने वाले शिखबद्ध जिनमंदिर हेतु आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त किया। दिन भर स्थिरता कर शाम को विहार करते हुए गुरुदेव कोठी मंदिर पहुंचें वहां श्री आदिनाथ जिनमंदिर के दर्शन किये । वहां से पूज्यश्री विहार कर पुनः चैतन्य पूरी पधार गये और वहां चौमासी प्रतिक्रमण किया।
 12 मार्च को सुबह वहां गुरु शांति मंदिर में मंगल प्रवेश हुआ । प्रवचन तथा पूजा आदि कार्यक्रम हुआ । सकल संघ के स्वामी वात्सल्य का आयोजन भी किया गया । वहां से शाम को विहार कर जिनेश्वर धाम दर्शन करते हुए हिमायत नगर पहुंचे। पीह निवासी श्री स्वरुप चंद जी कोठारी परिवार के द्वारा स्वागत किया गया और रात्रि स्थिरता भी उनके निवास स्थान पर हुई ।

13 मार्च को वहां से विहार कर सिकंदराबाद में डी वी कॉलोनी में पधारे वहां पर भी प्रवेश और वहां से  कंचन बाजार स्थित जैन भवन में प्रवेश और प्रवचन हुआ । शाम को श्री रणजीत चौधरी के निवास स्थान पर प्रवेश हुआ और वही रात्रि स्थिरता हुई ।

आज 14 मार्च  को सिकंदराबाद में बांठिया गार्डन में संक्रांति है। संक्रांति समारोह में श्री प्रेम- भुवनभानु सूरि समुदाय के पंन्यास श्री चंद्रशेखर विजय जी म.सा के प्रधान शिष्य आ.श्रीमद् विजय चंद्र जीत सूरि जी म.आदि ठाणा तथा स्थानकवासी श्रमण संघीय उपाध्याय श्री प्रवीण ऋषि जी महाराज आदि ठाणा भी पधारने वाले हैं।

14 शाम की स्थिरता गुरुदेव की श्री रमेश जी चौधरी के निवास स्थान पर रहेगी।

15 मार्च से सूरत गुजरात की और विहार प्रारम्भ होगा।


संक्रांति नाम

पंजाब  केसरी आचार्य श्रीमद् विजय वल्लभ सूरि जी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति शांतिदूत जैनाचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरि जी महाराज साहिब के मुखारविंद से....


Sunday, 12 March 2017

जिज्ञासा (2)

"मौन एकादशी"

प्रवचनकार - शांतिदूत गच्छनायक आचार्य विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी
एक बार बाइसवें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ परमात्मा द्वारिका नगरी पधारे। तब वासुदेव श्री कृष्ण भी दर्शन वन्दन हेतु पधारे। श्रीकृष्ण ने प्रश्न किया - भंते ! मैं दिन रात राज कार्यों में व्यस्त रहता हूँ । इसलिए धर्माराधना का विशेष समय नही मिल पाता । क्या पुरे वर्ष में ऐसा कोई दिवस है। जिसपर की गयी कम आराधना भी ज़्यादा फल प्रदान करे ❓

करुणानिधान श्री नेमिनाथ जी ने फ़रमाया कि ✔ मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का दिन बहुत श्रेष्ठ और उत्तम दिन है और उस दिन मौनपूर्वक की गयी धर्माराधना महान् फल देती है । सुव्रत नामक सेठ ने इस मौन एकादशी की विधिपूर्वक आराधना की थी और चरम और परम लक्ष्य - मोक्ष गति को प्राप्त किया था !!!

मौन एकादशी के शुभ दिवस पर

🎊 श्री अरनाथ परमात्मा का दीक्षा कल्याणक
🎊 श्री मल्लिनाथ परमात्मा का जन्म , दीक्षा , केवलज्ञान कल्याणक
🎊 श्री नमिनाथ परमात्मा का केवलज्ञान कल्याणक होता है ।

यही नही , भूतकाल - वर्तमानकाल - भविष्यकाल के जम्बूद्वीप - धातकीखंड और पुष्करार्ध द्वीप के भरत-ऐरावत-महाविदेह क्षेत्र के तीर्थंकरों को मिलकर दस नही , बीस नही , चालीस नही , सत्तर नही .... डेढ़ सौ ( 1⃣5⃣0⃣ ) कल्याणक मौन एकादशी के दिन होते हैं । इस कारण की गयी थोड़ी सी भी धर्म आराधना अनेक गुणा फल देती है ।

♈वल्लभ ♈ वाटिका के आद्य प्रेरणास्त्रोत पंजाबकेसरी आचार्य विजय वल्लभ सूरीश्वर जी म. ने अपने स्तवन में लिखा है -

तीन काल के श्री भगवान् , संख्या में तीस बखान ।
*कल्याणक डेढ़सौ मान , एकादशी महिमा गाने वाले ... *
धन धन नेमिनाथ भगवान् ।।
इस कारण महिमा खास , करे मौन पणे उपवास।
पौषध विधि सह उल्लास , मौन एकादशी करने वाले ...
धन धन नेमिनाथ भगवान ।।

श्री आचारांग सूत्र में फ़रमाया गया है -
" जे सम्मम् ति पासहा ते मोणं ति पासहा "
अर्थात् - जिसने सम्यक्त्व का स्पर्श कर लिया है , जिसका मन सम्यग्दर्शन में रम गया है , उसका मन मौन में रमण करता है !! मौनी मन को मारता नही, मन को साधता है।

वाक्शक्ति के सुनियोजन के अद्वितीय उदाहरण , मौन साधक , विरल विमल विभूति , आचार्यरत्न श्रीमद् विजय समुद्र सूरीश्वर जी म. का जन्म भी मौन एकादशी के पावन पावस दिवस पर हुआ था।

अतः मौन एकादशी को हम भी जितना हो सके पौषध की साधना अथवा जिनेन्द्र पूजा, स्वाध्याय, काउसग्ग, तपस्या आदि करें और विधिपूर्वक मौन एकादशी की आराधना कर मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हों, यही भावना.....

जिज्ञासा (1)

"सव्व-पावप्प-णासणो"


🎀 नवकार मन्त्र में कहा गया है कि पांचों परमेष्ठी को वन्दन करने से सभी पापो का नाश होता है। यह विचारणीय बात है कि वहां ऐसा नहीं कहा कि इससे पुण्य का बन्ध होता है!! पाप का नाश हो , यह अलग बात है और पुण्य बंधे - यह अलग बात है। परमात्मा ने पुण्य बाँधने पर इतना बल नहीं दिया बल्कि पाप के त्याग पर अधिक बल दिया है।

🎀 प्पणासणो का मतलब नाश नहीं , बल्कि प्रनाश है। पञ्च परमेष्ठी को वन्दन करने से पापों का नाश नहीं, बल्कि प्रनाश होता है। प्रनाश यानि जड़ मूल से खत्म होना। बीज को उखाड़ने पर वह पुनः उग सकता है लेकिन जड़ से खत्म करने पर नहीं उग सकता। उसी तरह पापों को जड़ मूल से खत्म करने का काम पञ्च परमेष्ठी को किया गया भावपूर्वक वन्दन करता है।


🎀 परमात्मा ने ऐसा नहीं कहा कि दुखों का नाश हो, परमात्मा ने कहा है कि पापों का नाश हो। हम दुखों को खत्म करने का सोचते हैं लेकिन वो दुःख क्यों होते हैं, उनका कारण क्या है, उनके कारण को खत्म करने का नहीं सोचते। पापों का नाश होगा तो दुखों का नाश स्वतः हो जायेगा जबकि दुखों का नाश से पापों का नाश हो जाये, ऐसा ज़रूरी नहीं है। हमारा लक्ष्य पापों का नाश होना चाहिए।


-- पंन्यासप्रवर श्री चिदानंद विजय जी म. के प्रवचनों से संग्रहित। .. 

Saturday, 11 March 2017

तुमरी शरण में आयो री...

मुनिराज मोक्षानंद विजय जी महाराज की आवाज़ में... जरुर सुनें।

Friday, 10 March 2017

वर्षीतप विशेष

चलो वर्षीतप करें.....

प्रत्येक श्रावक श्राविका को जीवन में भावपूर्वक तपस्या करनी चाहिए। इस वर्ष हम सभी को सामूहिक वर्षीतप करने का आह्वान करते हैं।

अखण्ड प्रेरणा के स्त्रोत 
समुदायवडील, वचनसिद्ध, तपसूर्य, तपचक्रवर्ती आचार्य श्रीमद विजय वसंत सूरीश्वर जी म.सा.

गुरुदेव का परिचय
पूज्य गुरुदेव ने मात्र 9 वर्ष की आयु में पंजाब केसरी आचार्य विजय वल्लभ सूरीश्वर जी से दीक्षा ग्रहण की थी। शुरू से ही वे तपस्या में रूचि रखते थे। बीते 49 वर्षों से वो बिना रूकावट वर्षीतप की तपस्या कर रहे हैं। यह वर्तमान में जैनशासन का रिकॉर्ड है। वल्लभ समुदाय के गच्छाधिपति आचार्य विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी भी फरमाते हैं कि उनकी ऊर्जा का स्रोत भी उनके उपकारी गुरु वसंत की तप तेजस्विता है।

वर्षीतप का रिकॉर्ड 
पूज्य गुरुदेव अभी 49वां अखण्ड वर्षीतप कर रहे हैं जिसका इस वर्ष 29 अप्रैल 2017 को हस्तिनापुर की पुण्यभूमि पर पारणा होगा। विविध शारीरिक वेदनाओं के बावजूद भी वे वर्षीतप की तपस्या को चालू रखेंगे एवं इस वर्ष 50वें वर्षीतप की तपस्या प्रारम्भ करेंगे।

वर्षीतप का इतिहास 
इस युग के प्रथम मुनि एवं प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी को दीक्षा के एक वर्ष तक उनके अंतराय कर्म के कारण शुद्ध आहार नहीं मिला। उनके 400 दिनों की निराहार तपस्या का पारणा हस्तिनापुर (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की भूमि पर श्रेयांस कुमार द्वारा इक्षुरस (गन्ने का रस) से हुआ था। परमात्मा की तपस्या के प्रतिबिम्ब स्वरुप पंचम काल के मानव की शक्ति अनुसार आहार संज्ञा के नाश हेतु एकान्तरे उपवास की वार्षिक तपस्या रूप वर्षीतप किया जाता है।

हमारा कर्तव्य
गुरुदेव तो तप की तेजस्विता से आत्मा को शुद्ध कर रहे हैं। हमें भी उस मार्ग का अनुसरण कर गुरुदेव के पदचिन्हों पर चलते हुए उनकी दीर्घायु की कामना करते हुए आत्मा की शुद्धि के लिए सामूहिक वर्षीतप प्रारम्भ करना चाहिए।

वर्षीतप का प्रारंभ चैत्र वदी 8 तदनुसार 21 मार्च 2017 से होगा। भावना बल से मन को सुदृढ़ कर वर्षीतप चालू करने की भावना रखें।

50 वें संयम वर्ष अनुमोदनार्थ..




*आज फाल्गुन सुदी तेरस*
शत्रुंजय गिरिराज पर *छ गाउ यात्रा का महान दिन*



यात्रा कीजे शत्रुंजय भावधारी,
होवे शत्रुंजय द्रव्य भाव अरी ।।
सत्द्रव्य, सत्कुल, सिद्धक्षेत्र, समाधि संघ वखानीय।
दुर्लभ पांच सकार ये जग में भविजन मानिये।।
सिद्धक्षेत्र अन्नति ऋद्धि भरी।। यात्रा०

पात्र पर्वत पुंडरीक अरु प्रथम जिनेसरु।
पर्व पर्युषण अरु परमेष्ठी पावन ईसारु।।
जानो दुर्लभ पांच पकार हरी।। यात्रा०

शिवपुर नदी शत्रुंजय श्रीशांति शत्रुंजय शमी।
दुर्लभ पांच शकार जानी करो धर्म न हो कमी।।
कहे वीर वीर प्रभु हरि मुख्य करी।। यात्रा०

अनन्त हुए श्री सिद्ध यहाँ पर सिद्धगिरी इस कारणे।
विमलगिरीवर विमल करता अग्रपद है तारणे।।
नमिये वारंवार प्रभु के पांव परी।। यात्रा०

तीर्थस्वामी मोक्षगामी आदि जिनवर वंदिये।
आतम लक्ष्मी हर्ष पामी कर्म कंद निकन्दीये।।
होये मुक्ति वल्लभ शिवनारी वरी।। यात्रा०



गिरिराज यात्रा गुरुराज के संघ
*स्वर्णिम स्मृति -2016*